मध्यप्रदेश के आर्थिक विकास में लघु उद्योगों के योगदान एवं संभावनाओं का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन (रीवा जिले के विशेष संदर्भ में)

 

डाॅ. रवि प्रकाश पाण्डे1, प्रदीप कुमार चैधरी2

1प्राध्यापक (वाणिज्य), शासकीय विवेकानंद महाविद्यालय मैहर, जिला सतना (.प्र.)

2शोधार्थी (वाणिज्य), शासकीय विवेकानंद महाविद्यालय मैहर, जिला सतना (.प्र.)

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

लघु उद्योग इकाई ऐसा औद्योगिक उपक्रम है जहाँ संयंत्र एवं मशीनरी में निवेश 1 करोड़ रुपए से अधिक हो, किन्तु कुछ मद जैसे कि हौजरी, हस्त-औजार, दवाइयों औषधि, लेखन सामग्री मदें और खेलकूद का सामान आदि में निवेश की सीमा 5 करोड़ रु. तक थी। लघु उद्योग श्रेणी को नया नाम लघु उद्यम दिया गया है। लघु उद्योगों को सदैव सन्तुलित क्षेत्रीय विकास बेरोजगारी दूर करने के उपाय के रूप में जाना जाता है। लघु उद्योग किसी भी अर्थव्यवस्था में उच्च दर से रोजगार का सृजन करते हैं तथा उत्पादन निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में लघु उद्योगों को बढ़ावा देना अधिक तर्क संगत है क्योंकि इनमें रोजगार सृजन की क्षमता अधिक होती है। आय के समान वितरण, नवउद्यमशीलता के विकास ओर विकेन्द्रीयकरण की क्षमता के गुणों के कारण विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को आगे ले जाने में लघु उद्योग मदद करते हैं तथा समावेशी विकास में आय के समान वितरण को बढ़ावा देते हैं। भारत जेसी अर्थव्यवस्था में जहां अदृश्य खुली बेरोजागारी अधिक है, लघु उद्योगों का महत्व ओर भी बढ़ जाता है। स्वतन्त्रता के उपरांत ही अर्थव्यवस्था के उत्तरोत्तर ओद्योगीकरण पर प्रमुखता से ध्यान दिया जा रहा है ताकि आयात कम करने के लक्ष्य को हासिल किया जा सकें लघु उद्योग आर्थिक विकास का अभिकर्ता भी हैं। द्वितीय पंचवर्षीय योजना, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के भारी उद्योगों के संवर्धन पर काफी जोर दिया गया था, में भी आर्थिक विकास ओर क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की प्रक्रिया में लघु उद्योगों के महत्व को स्वीकार किया गया था। लघु उद्योगों के माध्यम से क्षेत्रीय विषमता को दूर किया जा सकता है। लघु उद्योगों में स्थानीय कोशल स्थानीय कच्चे माल ओर कम पूंजी का निवेश होता है।

 

KEYWORDS: लघु उद्योग, घरेलू उत्पाद, आर्थिक विकास.

 

 


प्रस्तावना:-

लघु उद्योग देश के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लघु उद्योग, सकल घरेलू उत्पाद में केवल योगदान दे रहे हंै वरन् रोजगार निर्माण भी कर रहे है तथा निर्यात में भी अपना योगदान कर रहे हैं। यह अनुमान है कि लघु उद्योग विनिर्माण क्षेत्र में 45 प्रतिशत तथा कुल निर्यात में 40 प्रतिशत की भागीदारी रखते है। स्वतन्त्रता के बाद से लघु उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था में रणनीतिक भूमिका निभा रहे हैं। बदली भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों का महत्व ओर भी बढ़ता जा रहा है। वर्तमान समय में देश भर में लगभग 13 मिलियन से अधिक इकाइयों में 42 मिलियन लोग रोजगार प्राप्त कर रहे है। वर्तमान समय में लघु उद्योगों की वृद्धि दर 4.1 प्रतिशत तथा इनमें रोजगार निर्माण की दर 4 प्रतिशत है। लघु उद्योग वर्तमान समय मंे लगभग 6000 से अधिक उत्पादों का निर्माण कर रहे हंै, जिनमें पारम्पारिक वस्तुओं से लेकर उच्च तकनीकी से निर्मित वस्तुयें भी शामिल है। मध्य प्रदेश मंे 2014-15 तक 5 लाख से अधिक इकाइयाँ कार्यशील है जिनमें लगभग 5131 करोड़ की पूंजी लगी हुयी है ओर लगभग 20 लाख लोग रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश में लघु उद्योगों का विशेष महत्व है। प्रदेश में लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर सरकार अधिक से अधिक रोजगार का निर्माण कर सकती है।

 

लघु उद्योग भारत की क्षमताओं और भावी विकास की कुन्जी है, जिसके द्वारा उसके विशाल अविदोहित साधनों के विदोहन तथा लाखों व्यक्तियों की उत्पादन क्षमता का प्रयोग किया जा सकता है। देश के औद्योगिक विकास के लिए लघु औद्योगीकरण अपरिहार्य है और उस पर बल दिया जाना चाहिए। अतः औद्योगिक विकास होने पर लोगों के प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होगी। लघु उद्योग का विकास आधुनिक युग की एक अनिवार्य आवश्यकता है और आंचलिक तरक्की और खुशहाली लाने का प्रभावशाली विकल्प है, क्योंकि औद्योगिक विकास के बिना राष्ट्र तो देशवासियों को जीवन के प्रचुर साधन प्रदान कर सकता और ही ऐसा राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी भूमि का भली प्रकार निर्वाह कर सकता है इस प्रकार लघु उद्योगों का विकास अब एक युग-धर्म बन चुका है।

 

भारत की अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों को सदैव से ही एक महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ है। समय चक्र के साथ उनकी स्थिति में परिवर्तन होता रहा है। इनका अतीत अत्यंत गौरवमय रहा है। डाॅं.ब्रिटिश शासन कल में इनकी अवनति हो गई, फिर भी ये किसी प्रकार जीवित रहे। आजकल भारत सरकार इनके विकास के लिए भरसक प्रयत्न कर रही है। देश की औद्योगिक संरचना में लघु उद्योगों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। पहले ऐसा माना जाता था कि वे उद्योग जिनमें यांत्रिक शक्ति का उपयोग होने की दशा में पचास व्यक्ति कार्य करते थे अथवा यंात्रिक शक्ति का उपयोग होने की दशा में सौ व्यक्ति कार्य करते थे तथा जिनकी पूंजी 5 लाख रूपये से अधिक नही थी, लघु उद्योगों की श्रेणी में गिने जाते थे, किन्तु अब श्रमिक की संख्या एवं यांत्रिक शक्ति के उपयोग की शर्तो को हटा दिया गया है।

 

अब लघु उद्योगों की परिभाषा पूर्णरूपेण मशीनों एवं संयंत्रो में विनियोजित पूंजी पर ही आधारित की गई है, अब तक यह सीमा 5 लाख रूपये थी, किन्तु 1 मार्च 1967 से भारत सरकार द्वारा लघु उद्योगों के विषय में नई नीति लागू की गई। इसके अनुसार ऐसा समस्त औद्योगिक इकाइयों, जिनमें विनियोजित पूंजी की मात्रा 40 लाख रूपये से अधिक नहीं है, लघु उद्योगों की श्रेणी में सम्मिलित की जायेगी। विनियोजित पूंजी से यहां तात्पर्य केवल मशीनों एवं संयंत्रों से विनियोजित पूंजी से होगा तथा भूमि तथा भवनों आदि में विनियोजित पूंजी करोड़ रूपये की इस सीमा में सम्मिलित नहीं की जायेगी। लघु उद्योगो के इस नये आशय पर नियोजित श्रमिकों की संस्था का कुछ प्रभाव नही पड़ेगा अर्थात ऐसी इकाइयों में श्रमिकों की संख्या कितनी भी हो सकती है। कुछ विशिष्ट उद्योगों के ऐसे सहयक उपक्रम और संस्थान को भी लघु उद्यम की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है, जिनकी विनियोजित पूंजी (केवल मशीनों एवं संयंत्रों में) 70 लाख रूपये से अधिक नहीं है। 1 मई सन् 1975 में लघु उद्योगों के अर्थ में पुनः परिवर्तन करके इनके दायरे को बढा दिया गया है। इसके अनुसार-इस प्रकार ऐसी समस्त इकाइयाॅ जिनमें 100 व्यक्ति काम करते हों तथा जिनमें कुल पूंजी निवेश (भूमि एवं भवनों को छोड़कर) 70 लाख रूपये की हो, उन्हे लघु उद्योग कहेंगे। सहायक औद्योगिक इकाईयों की दशा में यह राशि 75 लाख रूपये कर दी गई हैं यह उल्लेखनीय है कि लघु उद्योगों को प्रारंभ करने के लिए शासन से लाइसेंस लेने की आवश्यक नहीं है।

 

वर्तमान औद्योगिक नीति के एक प्रस्ताव में इन उद्योगों के विकास करने पर बल दिया, फलस्वरूप उसके महत्व को स्वीकार किया गया। वास्तव में कटनी जिले में जहां पूूंजी का अभाव और बेरोजगारी का साम्राज्य है, लघु उद्योग आर्थिक सामाजिक और सभी पहलुओं से जिले के औद्योगिक विकास की आधारशिला है।

 

रोजगार एवं उत्पादन को बढ़ाने तथा आय के समान वितरण जैसे उद्देश्यों की पूर्ति में ग्रामीण एवं लघु उद्योगों का विशेष स्थान है ऐसा अनुमान है कि कटनी जिले के समस्त कुटीर एवं लघु उद्योगों में लगभग 30 प्रतिशत व्यक्ति लगे है। कटनी जिले की अर्थ व्यवस्था में लघु उद्योगों के महत्व का अनुमान इनसे प्राप्त होने वाले अनेक लाभों से लगाया जा सकता है। जिले की वर्तमान आर्थिक व्यवस्था में लघु स्तरीय उद्योगों का महत्व निम्नलिखित कारणों से है:-

 

1- रोजगार के अवसरों में वृद्धि:-

यह आदिवासी बाहुल्य जिला है जहां अधिकांश जनसंख्या गांवों में निवास करती है। जिले के 55 प्रतिशत व्यक्ति कृषि व्यवसाय में लगे हुए है जिन्हे कृषि साल भर पूर्ण कालीन काम प्रदान नहीं करती। अर्थात अर्थबेकारी की स्थिति है। चूंकि कुटीर एवं लघु उद्योग श्रम पूरक है और उनमे विनियोजित पूंजी अपेक्षाकृत अधिक रोजगार का सृजन करती है इसलिए जिले मे सहायक धंधे के रूप में लघु उद्योग वरदान सिद्ध हुए है। इस प्रकार रोजगार में पर्याप्त वृद्धि की जा सकती है। बड़े पैमाने के उद्योगों की तुलना में लघु उद्योग की रोजगार निर्माण क्षमता 8 गुनी अधिक होती है। अतः वर्तमान समय में रोजगार की दृष्टि से लघु उद्योगों का ऊॅचा स्थान है तथा भविष्य में अतिरिक्त श्रम शक्ति को रोजगार उपलब्ध करने की दृष्टि से इन उद्योगों का विस्तार वांछनीय है।

 

2. आय के अधिक समान वितरण में सहायक:-

लघु उद्योगों का संचालन अनेक लोगों द्वारा किया जाता है और इनका स्वामित्व भी अधिक लोगों के हाथों में होता है जिससे आर्थिक शक्ति का संकेन्द्रण नहीं होता। ग्रामीण क्षेत्रों के कुटीर उद्योग में प्रत्येक श्रमिक में स्वामित्व एवं स्वतंत्रता की भावना पाई जाती है तथा उसे अपने श्रम का उचित पारिश्रमिक प्राप्त होता है जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरती है। इस प्रकार लघु उद्योगों के विकास द्वारा अधिक लोगों मे धन का उचित वितरण होता है जिससे आय सम्पत्ति की असमानता दूर हो जाती है। अतः समाजवादी व्यवस्था की स्थापना लघु उद्योगों को सर्वोपरि स्थान देना अपेक्षित है।

 

3. ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अनुकूल:-

भारत कृषि प्रधान राष्ट्र है और लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है लेकिन कृषकों को वर्ष पर्यन्त कार्य नही मिल पाता अतः इस दृष्टि से कटनी जिले में ही नहीं वरन् भारत में लघु उद्योग अत्यंत उपयोगी है। चूंकि देश में पूंजी परक उद्योगों के स्थान पर श्रम पूरक उद्योगों का आर्थिक विकास होना चाहिए। लघु उद्योगों श्रम पूरक होते है इसलिए ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में कुटीर उद्योगों का विकास अपेक्षित है।

 

4. औद्योगिक विकेन्द्रीकरण में सहायक:-

लघु उद्योगों के विकास से उद्योगों के विकेन्द्रीकरण में सहायकता मिलती है क्यांेकि लघु उद्योगों को छोटे-छोटे गांवों एवं कस्बों में भी स्थापित किया जा सकता है। वस्तुतः देश का औद्योगीकरण तभी पूर्ण कहा जा सकता है जबकि उद्योग देश भर में चहुं ओर फैले हो। अतः औद्योगिक विकेन्द्रीकरण की दृष्टि से लघु उद्योगों का विकास अपरिहार्य है। लघु उद्योग को प्रोत्साहन देकर छोटे-छोटे गांवों को भी आधुनिक बड़े उद्योगों के सभी लाभ मिल सकते है। औद्योगिक विकेन्द्रीकरण के फलस्वरूप कच्चा माल निष्क्रिय बचत, स्थानीय प्रतिभा आदि स्थानीय साधनों का प्रयोग संभव होता है।

 

5. कलात्मक वस्तुओ का निर्माण:-

भारत की परम्परा और विदेशी मुद्रा कलात्मक वस्तुओं के निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जन की दृष्टि से भी लघु उद्योगों का विशेष स्थान है। साथ ही कला कौशल का विकास करने तथा उन्हे जीवित रखने की दृष्टिकोण से लघु उद्योगों का महत्व है।

 

6. तकनीकी ज्ञान की कम आवश्यकता:-

लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन छोटे पैमाने पर होता है और उत्पादन प्रणाली भी सरल होती है अतः इनमें तकनीकी ज्ञान की कम आवश्यकता पड़ती है। इस दृष्टि से भी लघु उद्योग अर्थ व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखते है।

 

7. शीघ्र उत्पादक उद्योग:-

लघु उद्योग शीघ्र उत्पादक उद्योग माने जाते है। इनमें धन विनियोग करने पर शीघ्र ही उत्पादन प्रारंभ हो जाता है अतः मुद्रा प्रसारित प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने और जीवन स्तर ऊॅंचा करने की दृष्टि से ऐसी शीघ्र उत्पादन में लघु उद्योग काफी महत्वपूर्ण होता है।

 

8. संतुलित आर्थिक विकास में सहायक:-

अधिकांशतः किसी भी राज्य में संतुलित आर्थिक विकास नही हो पाता है। कुछ क्षेत्रों में बड़े उद्योगों का केन्द्रीयकरण हुआ है। फलस्वरूप ऐसे राज्य समृद्ध है। इसके विपरीत आर्थिक दृष्टि से कुछ क्षेत्र काफी पिछड़े हुए है। बड़े पैमाने के उद्योग सामान्यतः बड़े शहरों में केन्द्रित है। देश के कुछ भागों का विकास करने से वास्तविक प्रगति नहीं हो सकती। अतः पिछड़े हुए क्षेत्रों का आर्थिक विकास करना अति आवश्यक है। सभी भागों का समुचित आर्थिक विकास की दृष्टि से लघु उद्योग अधिक सहायक सिद्ध होते है।

 

9. आयात पर कम निर्भरता:-

लघु उद्योग सामान्यतः स्थानीय साधनों एवं तकनीक पर निर्भर होते है जिसके परिणाम स्वरूप आयात की कम आवश्यकता होती है। देश से जहां भुगतान असंतुलन की समस्या रहती हो लघु उद्योग निश्चय ही उपयोगी है।

 

10. उत्पादन का मूल्य और विस्तार:-

लघु स्तरीय उद्योगों में अपेक्षाकृत कम पूंजी के विनियोग द्वारा अधिक विकास दर संभव होती है क्योंकि स्तर क्षेत्र की तुलना में लघु उद्योगों का उत्पादन पूंजी अनुपात कई गुना अधिक होता है। आंकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लघु उद्योग में वृहत क्षेत्र की तुलना में कहीं अधिक है।

 

11. अन्तरनिहित साधनों का उपयोग:-

लघु उद्योग निष्क्रिय समुचित धन, उद्यम संबंध योग्यता आदि साधनों का उपयोग करने में समर्थ होते है। लघु क्षेत्र के विस्तार के साथ छोटे-छोटे उद्यमियों का एक ऐसा वर्ग उभर आता है जो अर्थ व्यवस्था में गतिशीलता का संचार करता है। स्वतंत्रता के पश्चात लघु उद्योग का विकास इस तथ्य का प्रतीक है कि यदि विद्युत की आपूर्ति और ऋण सुविधा आदि के रूप में आधारभूत सुविधायें उपलब्ध की जायें तो लघु उद्योग विकसित होकर आंतरिक औद्योगिक साधनों का उपयोग किया जा सकता है।

 

12. मधुर औद्योगिक संबंधों की स्थापना:-

औद्योगिक शांति की समस्या प्रायः प्रत्येक देश में पाई जाती है। लघु उद्योगों में कम श्रमिक कार्य करते है और इनका परस्पर व्यक्तिगत सम्पर्क होता है और शांति का वातावरण बना रहता है, श्रमिकों को स्वतंत्रता होती है फलस्वरूप मालिक और सेवक की भावना का लोप हो जाता है। जिससे एक ओर औद्योगिक संघर्ष में और कमी आती है तथा दूसरी ओर औद्योगिक विकास में मदद मिलती है।

 

13. नैतिक गुणों का विकास:-

बड़े स्तर के उत्पादन में समाज में समाज में जिन स्वार्थपरता, निद्वेष, असहयोग, शोषण, असमानता, कटुता एवं प्रतिस्पर्धा जैसी अमानवीय प्रवृत्तियों को जन्म दिया है उनको नष्ट करके मानव समाज में सहयोग, सहानुभूति सहकारिता समानता आदि मानवीय प्रवृत्तियों का विकास कर संभव लघु स्तरीय उद्योगों के विकास एवं व्यापक विस्तार द्वारा ही संभव है।

 

14.    लघु स्तरीय उत्पादन से केवल मनुष्य के निजी व्यक्तित्व का विकास होता है वरन् अर्थव्यवस्था पर समाज का नियंत्रण संभव होता है।

15.    लघु उद्योग वृहत उद्योगों के लिए सहायक वर्गीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

16.    लघु उद्योगों द्वारा परम्परानुकूलता और निम्न वर्गीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

17.    लघु उद्योगों की कार्यप्रणाली सरल प्रकृति की होती है।

18.    लघु उद्योगों में औद्योगिक समस्याओं से मुक्ति रहती है।

 

कटनी जिले में भूमि, वन, खनिज, कृषि सम्पदा विशाल मात्रा में मौजूद है और वृहद लघु उद्योगों की स्थापना करने की आवश्यक क्षमता भी विद्यमान है। औद्योगीकरण की दृष्टि से कटनी जिला एक अत्यन्त विकसित जिला है शासन द्वारा वृहत्, लघु, उद्योगों को सस्ते मूल्य पर भूमि, पानी, बिजली किश्तों पर मशीनों, करों में छूट-छूट, ऋण एवं सहायता, कच्चे माल की व्यवस्था आदि सुविधाओं के फलस्वरूप जिले में काफी संख्या में नवीन लघु उद्योग स्थापित हुए है।

 

पूंजी विनियोजन की मात्रा, नियुक्त श्रमिकों की संख्या, संचालन शक्ति का प्रयोग, प्रयुक्त प्रोधिगिक का स्तर तथा संगठन प्रबंध का स्वरूप आदि बातों के आधार पर उद्योगों को सामान्यतया 3 भागों में विभाजित किया जाता है वृहत् शक्ति से चलाये जाते है। तथा जिसमें बड़े पैमाने पर वस्तुये उत्पादित की जाती है। वृहत उद्योग कहलाते है। इसके विपरीत लघु उद्योगों में वृहत् उद्योगों की अपेक्षा कम मात्रा में उत्पादन के विभिन्न साधनों का प्रयोग किया जाता है। वे उद्योग जिसमे हस्त प्रक्रियाओं से वस्तुये उत्पादित की जाती है और विद्युत शक्ति का कम या के बराबर उपयोग किया जाता है कुटीर उद्योग कहलाते है। लघु उद्योगों की दृष्टि से कटनी जिला निःसंदेह एक अत्यन्त आशाजनक चित्र उपस्थित करता है।

 

पूर्व में किये गये कार्यो की संक्षिप्त समीक्षा

लघु-स्तरीय क्षेत्र को सहायता के लिए एक बहुआयामी पैकेज की आवश्यकता होती है। वे अपनी समान भूमिका निभा सकते हैं बशर्ते कि उनके पास एक ध्वनि आधार हो। 1991 की औद्योगिक नीति विशेष रूप से लघु उद्योग (भारत सरकार 2000) के लिए एक ऐतिहासिक नीति थी, जिसने इस क्षेत्र के संवर्धन और सुदृढ़ीकरण पर जोर दिया। इस तथ्य से कोई इनकार नहीं करता है कि रोजगार-उत्पादन अनुपात छोटे पैमाने पर क्षेत्र में सबसे कम है लेकिन रोजगार सृजन की क्षमता बड़े पैमाने पर क्षेत्र की आठ गुना है।

 

आरती देवेश्वर (2006) लघु उद्योग क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के एक जीवंत और गतिशील क्षेत्र के रूप में उभरा है जो कुल औद्योगिक उत्पादन का लगभग 40 और राष्ट्रीय निर्यात में 34 से अधिक का योगदान देता है। वर्तमान में यह क्षेत्र 250 लाख से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा है। यह उद्यमी प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिए नर्सरी के रूप में और तीन से अधिक इकाइयों के विस्तृत नेटवर्क के माध्यम से औद्योगिक विकास के उत्प्रेरक के रूप में भी कार्य करता है देश के अनुसार देश की कुल औद्योगिक इकाइयों का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा है। विश्व व्यापार प्रणाली लगातार नई चुनौतियों की पेशकश कर रही है और साथ ही नए खतरे पैदा कर रही हैय जैसे ही टैरिफ और कोटा हटा दिए जाते हैं, नए तकनीकी मानदंड, सैनिटरी और उपाय और एंटीडंपिंग क्रियाएं उभरती हुई अर्थशास्त्र में व्यापार के लिए अधिक चुनौतियों का सामना कर रही हैं। विश्व व्यापार संगठन हर आर्थिक गतिविधि को प्रभावित करने के लिए बाध्य है- लघु क्षेत्र कोई अपवाद नहीं है। विश्व व्यापार संगठन समझौतों ने कई तरह के खतरों और चुनौतियों को जन्म दिया है।

 

आरमू, मुकेला आयंडा (2011) सतत विकास को पर्यावरण को नीचा दिखाए बिना आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक आवश्यक आवश्यकता के रूप में पहचाना जाता है, स्थिरता की अवधारणा को लागू करने में बड़ी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। सबसे बुनियादी स्तर पर, सतत विकास से निपटने वाले शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि स्थिरता की उपलब्धि के लिए पारिस्थितिक रूप से स्थायी राजनीतिक और आर्थिक प्रणालियों, संगठनों और व्यक्तियों (ैजंतपा ंदक त्ंदके 1995 ब्वेजंद्रं ंदक क्ंसल 1992द्ध गैलप इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट 1992) की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से, सरकारें, उपभोक्ता और उद्यम योगदान देते हैं और सतत विकास तक पहुँचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परिणामस्वरूप, यदि स्थिरता के लक्ष्यों को प्राप्त किया जाना है, तो छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों को उनके नकारात्मक पारिस्थितिक और सामाजिक प्रभावों को कम करने के लिए सुधार किया जाना चाहिए (ग्लैडविन, 1992)

 

अशोक शर्मा और कुमार (2011), इस लेख का मुख्य उद्देश्य भारतीय फर्मों की लाभप्रदता पर कार्यशील पूंजी के प्रभाव की जांच करना है। शोधकर्ता की खोज विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बाजारों से महत्वपूर्ण रूप से प्रस्थान करती है। परिणाम बताता है कि भारतीय कंपनियों के अनुसंधान में सकारात्मक रूप से सहसंबद्ध में कार्यशील पूंजी प्रबंधन और लाभप्रदता यह भी दर्शाता है कि दिन की संख्या और दिनों की संख्या की सूची। भुगतान नकारात्मक रूप से होता है, जबकि दिनों की संख्या प्राप्य और नकदी रूपांतरण अवधि कॉर्पोरेट लाभप्रदता के साथ सकारात्मक संबंध बनाती है।

 

शोध का उद्देश्य -

किसी भी सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र से संबंधित तथ्यों के अध्ययन के लिए निश्चित उद्देश्यों का होना अत्यंत आवश्यक है इन्ही उद्देश्यों के आधार पर शोधार्थी को अपना शोध कार्य करना प्रारंभ करता है। प्रस्तुत लघु शोध प्रबंध के उद्देश्यों का उल्लेख निम्न प्रकार से किया गया है-

1. नवीन आर्थिक सुधारों के बाद लघु उद्योगों की प्रगति का अध्ययन करना।

2. नवीन आर्थिक सुधारों का लघु उद्योगों के उत्पादन निर्यात पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना।

3. लघु उद्योगों की रोजगार सृजन क्षमता का अध्ययन करना।

4. लघु उद्योगों में श्रमिकों को प्राप्त होने वाले सामाजिक सुरक्षा के लाभ का अध्ययन करना।

5. लघु उद्योगों के विपणन के का अध्ययन करना।

6. लघु उद्योगों के विकास में आधारभूत संरचना की भूमिका का अध्ययन करना।

7. लघु उद्योगों की समस्याओं का अध्ययन करना।

8. लघु उद्योगों के त्वरित सतत विकास के लिये सुझाव प्रदान करना।

9. लघु एवं छोटे व्यवसायों में माल एवं सेवा कर के प्रभावों को जानना है।

10. छोटे व्यवसायों व्यवसायियों में आने वाली समस्याओं को ज्ञात करने का प्रयास किया गया है।

 

परिकल्पना

प्रस्तुत शोध की निम्नलिखित परिकल्पनाएं हैं -

1. आर्थिक सुधारों के पश्चात् लघु उद्योगों के उत्पादन में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

2. आर्थिक सुधारों के पश्चात् लघु उद्योगों की रोजगार सृजन क्षमता में वृद्धि हो रही है।

3. लघु उद्योगों मंे श्रमिकांे को सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिल रहा है।

4. शहरी और ग्रामीण लघु उद्योग ग्रामीण आबादी को ऋण प्रदान करने के लिए संगठनों का सबसे उपयुक्त रूप हैं।

5. हाल के वर्षों में लघु उद्योग के मात्रात्मक विकास ने श्रमिकों के समग्र गुणात्मक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।

6. लघु उद्योगों की परिचालन - दक्षता, लाभप्रदता और सॉल्वेंसी, यथोचित हैं।

7. प्रभावी ऑडिट, प्रभावी प्रसार प्रबंधन, पेशेवर प्रबंधन, मानव संसाधन प्रबंधन और कर योजना और कर प्रबंधन के माध्यम से लघु उद्योगों के लिए वित्तीय अनुशासन की तत्काल आवश्यकता है।

8. लघु उद्योगों के संचालन पर प्रभावी नियंत्रण की तत्काल आवश्यकता है।

 

शोध प्रविधि:-

किसी भी शोध कार्य को उद्देश्यहीन एवं ज्ञानरहित नहीं कहा जा सकता है। इसके लिए कुछ निश्चित कारकांे से प्रेरित होकर ही निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये शोध-कार्य किया जाता है। ज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य अपरिहार्य है। वर्तमान युग में शोध या अनुसंधान का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि किसी भी क्षेत्र से संबंधित तथ्यों का प्रमाणीकरण, नवीनीकरण, एवं सत्यापन अनुसंधान के द्वारा ही किया जा सकता है।

 

शोध कार्य में मध्यप्रदेश के आर्थिक विकास में लघु उद्योगों के योगदान एवं संभावनाओं का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन- कटनी जिले के विशेष संदर्भ में’’ से सम्बन्धित वास्तविक एवं विश्वसनीय आंकड़ों को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आंकड़ों को एकत्र कर पूर्ण किया गया है। प्राथमिक आकड़े स्वयं कार्य स्थल पर जाकर मूल स्रोतों एवं साक्षात्कार अनुसूची द्वारा एकत्र किये गये हैं। जबकि द्वितीयक आंकड़े मध्यप्रदेश के आर्थिक विकास में लघु उद्योगों के योगदानएवं संभावनाओं से संबंधित विभिन्न प्रकाशित- अप्रकाशित पुस्तकों, शोध पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, आदि से एकत्र कर प्रयोग किये गये हैं।

 

शोध का औचित्य:-    

किसी शोध कार्य की शुरुआत किसी उद्देश्य को लेकर होती है। यह उद्देश्य अपना एक विशेष महत्व रखता है। किसी भी शोध प्रबंध कार्य को आरम्भ करने से पहले यह जान लेना अत्यंत आवश्यक है कि वर्तमान शोध क्यों किया जा रहा है ? शोध की समस्याएँ क्या हैं ? इन समस्याओं का अध्ययन कर सही सुझाव एवं परामर्श देकर, संभावित परिणाम एवं निष्कर्ष तक पहुॅचना ही शोध का औचित्य है। किसी भी शोध कार्य को तभी सफल माना जाता है जब उसका वास्तविक निष्कर्ष निकले एवं सही परिणाम सामने आये तथा परिणाम सार्थक हों।

 

अध्ययन क्षेत्र:-

प्रस्तुत अध्ययन रीवा जिले के संबंध में है जिसकी कुल जनसंख्या 2,365,106 है, जिसमें से पुरुष 1,225,100 एवं महिलाएँ 1,140,006 है एवं 1000 पुरुषों के अनुपात में 960 महिलाएँ है। शोधार्थी द्वारा अध्ययन क्षेत्र में जाकर अनुसूची साक्षात्कार विधियों के माध्यम से आंकड़े एकत्रित किये गये जिसमें से शोधार्थी द्वारा 50 व्यक्तियों को लेकर के शोधकार्य पूरा किया अध्ययन के दौरान जो आॅकड़े एकत्रित किये गये उनका परिचात्मक विश्लेषण निम्नानुसार है।

 

आकड़ों का वर्गीकरण और सारणीयन:-

अनुसंधानकर्ता द्वारा तथ्यों को प्राप्त करने के बाद संकलित तथ्यों को सारणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है और साख्यकीय विष्लेषण किया गया है।

 

रीवा जिले में स्थापित वृहद उद्योगों की सूची

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1-

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1982

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2-

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1985

13-00

3-

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1986

13-00

4-

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1989

192-00

5-

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1991

175-00

6-

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1992

40-00

7-

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1992

800-00

8-

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1989

17-00

9-

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1991

8-00

10-

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1994

11-00

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2010&11

415

393

22

5-30

2011&12

454

434

20

4-60

2012&13

440

422

18

4-09

2013&14

448

427

21

4-69

2014&15

430

411

19

4-42

2015&16

402

391

11

2-76

2016&17

606

602

04

2-86

2017&18

553

537

16

2-86

2018&19

509

493

16

3-14

2019&20

203

475

28

5-57

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4760

4585

175

3-67

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रीवा जिले में कुटीर उद्योगों का भविष्य काफी उज्जवल है मऊगंज, हनुमना, नईगढ़ी तहसील में बनाई जाने वाली दूरी एवं कालीन काफी प्रचलित हो रही है और रीवा की पहचान बन चुके सुपाड़ी के खिलौने ने रीवा जिले में कुटीर उद्योगों को स्थापित किया है।

 

रीवा जिले में कोल्ड स्टोरेज, आटा चक्की, दाल मिल, चावल मिल तेल मिल, ब्रेकरी, लकड़ी चिराई, बांस के बर्तन एवं फर्नीचर, लकड़ी के फर्नीचर एवं खिलौने, काॅपी, जूते-चप्पल, मोमबत्ती, अगरबत्ती, पापड़, स्टोन क्रेशन, ंइजीनियरिंग वर्कस, मोटरगाड़ी बाइरिंग एवं बिल्डिंग डिजल इंजन मरम्मत, मिट्टी के बर्तन, डेरी मिनरल वाटर, प्लांट, आदि का स्थापित किया जा चुका है।

 

जिला रीवा में पंजीकृत लघु एवं कुटीर उद्योग

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2015&16

454

255-21

895

2016&17

440

244-24

884

2017&18

448

248-35

815

2018&19

430

239-29

801

2019&20

478

322-78

543

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2250

1308-87

3938

स्त्रोतः- जिला व्यापार एवं उद्योग केन्द्र रीवा

 

जिला व्यापार एवं उद्योग केन्द्र से प्राप्त आॅंकडों से जिले में विगत पाॅंच वर्षो में कुल 2250 लघु एवं कुटीर उद्योग स्थापित हुए जिनमे 1308.87 लाख रूपयें की पूॅंजी विनियोजित की गई, तथा 3938 लोगों को रोजगार प्राप्त हुए। ये आॅंकडे जिला उद्योग केन्द्र पर संधारित अवश्य हैं, किन्तु शोधार्थी द्वारा किये गये सर्वेक्षण से यह स्पष्ट हुआ है कि ये सभी उद्योग नाम मात्र के कुछ समय के लिए स्थापित होते है, तथा कुछ ही समय (02 या 03 वर्ष) में ये बीमार उद्योग की श्रेणी में आकर पूॅंजी के अभाव या शासन की उपेक्षा के चलते बन्द हो जाते है। सर्वे में यह भी पाया गया है कि यह 80 प्रतिशत कुटीर उद्योग के अन्तर्गत बसोर जाति के द्वारा संचालित है। साथ ही इन्हे जो पूॅंजी उपलब्ध कराई जाती है, उनमें से लगभग आधी राशि सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग के हत्थे चढ़ जाती हैं। उक्त आॅंकडे़ यह अवश्य स्पष्ट करते है कि औद्योगिक विकास के परिप्रेक्ष्य में जिले में प्रतिवर्ष लघु उद्योग स्थापित हो रहे है। किन्तु सत्य यह है कि ये मात्र सरकार के लक्ष्य पूर्ति की दृष्टि से कारगर अवश्य है, पर इनसे जिले में आर्थिक विकास पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ा है।

 

निष्कर्ष

हमारे विचार से लघु उद्योग भारत की क्षमताओं और भावी विकास की कुंजी है जिसके द्वारा उसके विशाल अविदोहित साधनों के विदोहन तथा लाखों व्यक्तियों की उत्पादन क्षमता का प्रयोग किया जा सकता है। लघु उद्योगों एवं कुटीर उद्योगों में आज की अनेक ज्वलंत समस्याओं का समाधान निहित है।

 

देश के औद्योगिक विकास के लिए कुटीर और लघु औद्योगीकरण अपरिहार्य है और उस पर बल दिया जाना चाहिए। अतः औद्योगिक विकास होने पर लोगों की प्रति व्यक्ति आप में वृद्धि होगी। लघु उद्योग का विकास आधुनिक युग की एक अनिवार्य आवश्यकता है और आंचलिक तरक्की और खुशहाली लाने का प्रभावशाली विकल्प है, क्योंकि औद्योगिक विकास के बिना राष्ट्र तो देशवासियों को जीवन के बिना राष्ट्र तो देशवासियों के जीवन में प्रचुर साधन प्रदान कर सकता और नहीं ऐसा राष्ट्र अंतर राष्ट्रीय मंच पर अपनी भूमिका का भली प्रकार निर्वाह कर विकास अब एक युग-धर्म बन चुका है।

 

लघु उद्योग बेरोजगारों तथा बढ़ती हुई जनसंख्या को रोजगार देने के के लिये और राष्ट्र का चैमुखी विकास के लिए इन उद्योग के विकास आवश्यक है। भारतीय परम्पराओं तथा कलाकृतियों और वेशभूषा की संरचना के संरचना के संरक्षण के लिए भी यह उद्योग महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र के विकास तथा लोगों में समान आय के उद्देश्य से भी लघु उद्योग महत्वपूर्ण है।

 

सन्दर्भ ग्रंथ सूची

1.       डाॅ. सिन्हा, बी.सी.2010, भारतीय अर्थव्यवस्था, साहित्य भवन पब्लिसर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटस,

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3.       पन्त डी.सी. - भारत में ग्रामीण विकास 2009, त्रिपोलिया कालेज बुक डिपो जयपुर।

4.       गुप्ता, ओम प्रकाश एवं गुप्ता जी.पी. एवं कश्यप, एस.पी.-लघु उद्योग एवं महिला उद्यमिता वर्तमान स्थिति और विश्लेषण

5.       त्रिपाठी, एन.सी -उद्यमिता विकास रमेश रमेश प्रकाशन मेरठ

6.       उद्यमिता समाचार पत्र      - उद्यमिता विकास केन्द्र .प्र. सेडमैप जहांगीराबाद भोपाल

7.       स्वरोजगार एवं मार्गदर्शन श्रम मंत्रालय भारत सरकार जबलपुर।

8.       समूह प्रबंधन एवं उद्यमिता विकास केन्द्र भोपाल।

9.       फडिया बी.एल. 2005., लोक प्रकाशन एवं शोध प्रविधि, साहित्य भवन पब्लिकेशन, आगरा

10.    गंगराडे के.डी. 2008., गांधी के आदर्श और ग्रामीण विकास, राधा पब्लिकेशन, दरियागंज, नई दिल्ली

11.    गर्ग डी.पी.1993. समन्वित ग्रामीण विकास एवं सहकारिता, शिवा प्रकाशन, इन्दौर

12.    गुप्ता एम.एल. एवं शर्मा डी.डी. 2007., भारतीय ग्रामीण समाजशास्त्र, साहित्य भवन पब्लिकेशन, आगरा

13.    गोयल अनुपम 1993. भारतीय अर्थव्यवस्था, शिवलाल अग्रवाल एण्ड कम्पनी, इन्दौर

 

 

 

Received on 27.12.2022         Modified on 08.01.2023

Accepted on 17.01.2023        © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2022; 10(4):183-191.